Dhara ko uthao, Gagan ko jhukao

Neeraj ji once again
idyao sao imaTogaa na mana ka AÐQaora
Qara kao ]zaAao¸ gagana kao JaukaAao.

bahut baar AayaI ga[- yah dIvaalaI
magar tma jahaÐ qaa vahIM pr KD,a hO¸
bahut baar laaO jala bauJaI pr ABaI tk
kÔna rat ka hr camana pr pD,a hO¸
na ifr saUya- $zo¸ na ifr svaPna TUTo¸
}Yaa kao jagaaAao¸ inaSaa kao saulaaAao.
idyao sao imaTogaa na mana ka AÐQaora
Qara kao ]zaAao¸ gagana kao JaukaAao.

saRjana SaaMit ko vaasto hO ja$rI
ik hr War pr raoSanaI gaIt gaayao¸
tBaI maui@t ka ya& yah pUNa- haogaa
ik jaba Pyaar tlavaar sao jaIt jaayao¸
GaRNaa baZ, rhI hO¸ Amaa caZ, rhI hO¸
manauja kao ijalaaAao¸ dnauja kao imaTaAao.
idyao sao imaTogaa na mana ka AÐQaora
Qara kao ]zaAao¸ gagana kao JaukaAao.

baD,o vaogamaya pMK hOM raoSanaI ko
na vah baMd rhtI iksaI ko Bavana maoM¸
ikyaa kOd ijasanao ]sao Sai@t bala sao
svayaM ]D, gayaa vah QauÐAa bana pvana maoM¸
na maora¹tumhara¸ saBaI ka p`hr yah
[sao BaI baulaaAao¸ ]sao BaI baulaaAao.
idyao sao imaTogaa na mana ka AÐQaora
Qara kao ]zaAao¸ gagana kao JaukaAao.

Agar caahto tuma ik saara ]jaalaa
rho dasa banakr sada kao tumhara¸
nahIM jaanato ik fUsa ko gaoh maoM pr
baulaata saubah iksa trh sao AMgaara¸
na ifr kao[- Aigna rcao rasa [sasao¸
saBaI rao rho AaÐsauAaoM kao hÐsaaAao.
idyao sao imaTogaa na mana ka AÐQaora
Qara kao ]zaAao¸ gagana kao JaukaAao.

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2 thoughts on “Dhara ko uthao, Gagan ko jhukao

  1. Talkhroshan

    Dear Srivani
    Read this poem also and think without this your colletion is not complete.Taken from KAVI DEEPAK SHARMA’s website.
    http://www.kavideepaksharma.co.in
    सागर के तीर पर रेत के मैंने और तुमने
    जो घरोंदे स्नेह के बनाये थे कभी
    नयनों में अपने कल्पनाओं के दीपक
    साथ मिलकर जिस जगह जलाए थे कभी
    अब वहाँ कुछ भी नज़र आता नहीं
    बस टूटती लहरों के साए दिखते हैं ॥

    कुछ पथिक , कुछ लहरों के कदमों तले
    स्वप्न सारे रेत ही रेत में मिल गए
    रोंद कर घर निर्दयी पग के कारवां
    काफिलों के रूप धर दूर निकल गए
    गीत अब माँझी अब वहाँ गाता नहीं
    बस दिल तड़पता है और अश्रु चीखते हैं ॥

    अब नही वो अठखेलियाँ जिसकी फिजा में
    आवाज मेरी आरजू की गूंजती थी
    अब नही वहाँ लगते मेले चुहल के
    जिनकी ज़िन्दगी कल बेफीक्र सी जहाँ घुमती थी
    अब पाँव लहरों में वहाँ कोई भिगोता नहीं
    बस लहरें टकराती हैं और पत्थर भीगते हैं ॥

    दरख्त भी ख़ामोश से उजड़े से खड़े हैं छाँव में
    जहाँ की कभी बैठे थे हम तुम
    घास जो चुभती थी बदन में मखमल सी
    अब आँख बंद करके वहां खड़ी है गुमसुम
    तिनका कोई तोड़ के मूहँ में रखता नहीं
    बस सीना उस जगह के पैर रौंदते हैं ॥

    Reply
  2. Talkhroshan

    one more for you.Read This and enjoy.Wrote by KAVI DEEPAK SHARMA………
    हर बाम पर रोशन काफ़िला – ए – चिराग़
    हर बदन पर कीमती चमकते हुए लिबास
    हर रूख पर तबस्सुम की दमकती लहर
    लगती है शब भी आज कि जैसे हो सहर
    माहौल खुशनुमा है या खुदा इस कदर
    दीखता है कभी – कभी ऐसा बेनज़ीर मंज़र ।

    मैं सोचता चल रहा हूँ अपने घर कि ओर
    कहाँ चली गई तारिकियाँ ,कहाँ बेबसी का ज़ोर
    कहाँ साये – ग़म के खो गये , कहाँ निगाह से आब
    कहाँ खामोशियाँ लबों की , कहाँ आहों का शोर
    पूरा शहर की तरह झिलमिला रहा है
    जर्रा – ज़र्रा बस्तियों का नज़्म गा रहा है ।

    डूबा इसी ख्याल में जब मैं अपना दर
    खोलता हूँ तो दिखती हैं खामोशियाँ, तन्हाइयां
    पूरे शहर की तीरगी , पूरे शहर का दर्द
    पूरे शहर की बेबसी और आह की परछाइयाँ ॥

    TALKH ROSHAN

    Reply

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